अपने ही यहां अक्सर छ्लेंगें-गजल-शिवचरण दास

पांव नंगे रेत में चलकर जलेगें
हमको अपने ही यहां अकसर छलेंगें.

राख हो जायेंगी जिस दिन झोपंडी अपनी
उनके महलों में दिये घी के जलेंगें.

राह मे कितनी हो मुश्किल बढते जायेंगें
लाल हैं तो सिर्फ गुदडी मे खिलेंगें.

हर घडी हर पल निखरते जायेगें
दर्द की भट्टी में जितने भी तपेंगें.

जिसने हमको बेवफा ठहरा दिया
उम्र भर हम नाम उनका ही जपेंगें.

जिन्दगी भी दास है कितनी अजीब
जो डरेंगें वो यहां पहले ही मरेंगें.

शिवचरण दास

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