पीड़

___________* पीड़ *_____________

पेशावर कुकृत्य से मन पे बहुत पीड़ा हुई उसी के संदर्भ में दिल में कुछ जज्बात उभरे कैसे व्यक्त करू समझ नही आता !

आन बसा फिर शैतान इंसानो के वेश मैं !
हुआ कुकृत्यो का बोलबाला सारे देश मैं !!

ईमान-धर्म इंसानो मैं रहा अब शेष नही !
किस रूप में आ जाए मौत का भेष नही !!

कितना हिंसक, कितना क्रूर और भयावह !
नरभक्षी पशुता की सबसे बड़ी पहचान यह !!

दिन प्रतिदिन हो रहा अन्याय अथाह !
शुन्य बनी मनुष्य संवेदना लापरवाह !!

जाने कब,कहाँ, और कैंसे हो जाए जीवन अंत !
खो रहे अस्तित्व स्वयं ही, हम जीवन प्रयन्त !!

पनपता हुआ पल पल, हर मन आत्म द्वेष !
जूझ रहे सब दुविधा से बसा दिलो में क्लेश !!

बंद हुए सब द्वार वफ़ा के नही रहा पथ शेष !
लगा आघात ग्रसित है मन लगी गहरी ठेस !!

विचलित हूँ, मन, आत्मा और पूर्ण शरीर से !
निर्बल हूँ असहाय हूँ, कैसे उबरु इस पीड से !!

One Response

  1. C.M. Sharma babucm 24/12/2016

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