मनकी पीड़ा

मनकी पीड़ा
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मुश्किल है बड़ा समझना अपनों को
पल-पलमें है ईर्ष्या, शंका अपनों पे
दुनियां हसती बतातें तो मनकी पीड़ा
क्या कर सकता वो भी इसी से मरता
तमासा देखतें तमासा बनकर वो तो
पीड़ा बड़ा है क्यूं करे मल्हम और को
सीधे लोग मरता अंदर हो या बाहर
यही तो रित है आगे बढ़ाते सब लोग
मिट-मर्ने के कसम रिश्तें नातें कुछ नहीं
थॉट से जीते कुछ भी हो बस हो अपनी
किसी को क्या कहें छोटे मुंह बडें बातें
सब है ज्ञानी अपनें लिये तुमसे क्या पूछें
आज का घर है सिर्फ मकान जहां रहतें
लोगों के जंगल चलते-फिरते हम खोते |

-राम शरण महर्जन
कीर्तिपुर, काठमांडू

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