बेवजहा ही सही-गजल-शिवचरण दास

बेवजह ही सही बदनाम तो किया आखिर
आपने अपना हमें कुछ मान तो लिया आखिर.

हर कदम पर तोहमतें व यातनाओं के शिविर
दोस्ती को दुशमनी का नाम तो दिया आखिर.

जिन्दगी भर जिसके हाथों मात ही खाते रहे
अक्ल आते ही उसे पहचान तो लिया आखिर.

अपने हाथों की लकीरें रोज खुद पढ्ता रहा
आखिरी दम में खुदा का नाम तो लिया आखिर.

झूंठे वादों का महल भी एक पल में डह गया
सामने आते ही साकी जाम तो दिया आखिर.

डुबकर भी नाव जर्जर लहरों से लडती रही
वहशी दरिया तमाम काम तो किया आखिर.

हर जुबां पै सख्त पहरा है यहां खैरात का
हर कदम पर न्याय का झाम तो किया आखिर.

अजनबी कहकर हमीं पर आइना हंसता रहां
एक चेहरा और भी है जन तो लिया आखिर.

अपने कन्धों पै उठाए घूमते हैं अपनी लाश
दास आका ने यही ईनाम तो दिया आखिर.

शिवचरण दास

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