फिर सुख ने दिया झांसा-गजल-शिवचरण दास

फिर सुख ने दिया झांसा अभिशाप चला आया
दर्द पारे सा फिसलकर चुपचाप चला आया.

मांगी हैं यहा मन्नत पत्थर से सदा हमने
लगता है कही दर से भगवान चला आया.

पहनें हैं बहुत चस्मे दुनिया ने यहां रंगी
बदरंग हुए हैं मौसम तूफान चला आया .

अब है जमाने में बस उसका ही बोलबाला
संगीन बहुत मुजरिम पर बेदाग चला आया.

रातों ने यहां अक्सर सपनो को चुराया है
आंखों मे कोई मादक उन्माद चला आया.

अपनों की नही चाहत गैरो से नही शिकवा
पडता है जिसे मतलब वो दास चला आया.

जीने की तमन्ना ने पलके ही तो खोली थीं
दस्तक के बिना लेकिन काल चला आया.

शिवचरण दास

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  1. satyendra 14/12/2014

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