आदमी की आस्था-गजल-शिवचरण दास

आदमी की आस्था को आजमाने के लिये
बुत बनायें हैं हजारों बरगलाने के लिये .

न्याय के चाबुक यहां काम आते हैं सदा
बेबसों की पीठ पर नक्शे बनाने के लिये.

जानता हूं एक दिन तलवार गर्दन पर चलेगी
सच सदा दन्डित हुआ है सर उठाने के लिये.

उडना था जिसको आसमा के आखिरी उनवान तक
पर कतर डाले उन्हीं के घर सजाने के लिये.

क्या करोगे नफरतों की आग सुल्गाकर यहां
एक चिंगारी बहुत थी घर जलाने के लिये.

छोड दे अब मोह उनका दास बेगाने हुए
क्यूं बसाता है शहर अपना लुटाने के लिये.

शिवचरण दास

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