सृजन

नीली आँखें
भरा पूरा
गदराया जिस्म
उफ़नता यौवन
अछूता रूप
शीतल तरुणाई
इन सब से मिला कर
बनी हो तुम
ऐ मेरी पिघलती कविता

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