जायें तो कहां जायें-शिवचरण दास

वह खौफ का मन्जर है साये भी सहम जायें
हर हाथ में खन्जर है जाये तो किधर जायें.

दो जून की रोटी और पानी की जहां किल्लत
लुटने का वहां डर है जायें तो किधर जायें.

इन चन्द धमाकों से कुछ भी तो नहीं होगा
दुनियां ये सितमगर है जायें तो किधर जायें.

हमने तो बहुत चाहा कि आपके हो जायें
दिल आपका पत्थर है जायें तो किधर जायें.

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शेर

जिन्दगी है गम खुशी का वो सफर
खत्म होता मन्जिले मौत तक जाने के बाद.

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मन्जिल पर कर मुझे कारवां छोड्ना पड्ता
चलो अच्छा हुआ मुझको मन्जिल ही ना मिली.

शिवचरण दास

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