फिर भी हसतें हैं -गजल-शिवचरण दास

दिल में गहरा दर्द समाया फिर भी हसतें हैं
आंखों में दरिया भर आया फिर भी हसतें हैं.

क्या शिकवा गैरों से करना अपने रुठ गये
यारों ने खन्जर चमकाया फिर भी हसतें हैं.

अपनी अपनी नफरत लेकर टूट गये हैं लोग
कदम कदम पर धोखा खाया फिर भी हसंते हैं.

जितनी पीते हैं उतनी ही प्यास भड्कती है
जहर गल्रे तक भर आया फिर भी हसते हैं.

जब लहरों ने हद से बढ्कर तोड दिये सारे बन्धन
दरिया ने कुहराम मचाया फिर भी हसते हैं.

तेरी यादों के ही अकसर हम दीप जलातें हैं
दुनिया ने पागल बतलाया फिर भी हसते हैं.

अपने गम की आप दवा की सिर्फ दुआ मांगी
उसकॉ भी तुमने ठुकराया फिर भी हसते हैं.

जुर्म यहां पर किसने ढाये वक्त ही बोलेगा
कत्ल मुन्शिफ बनकर आया फिर भी हसतें हैं.

अब इस बस्ती का मालिक सिर्फ खुदा है दास
हर घर में शैतान बसाया फिर भी हसते हैं.

शिवचरण दास

Leave a Reply