आहटों से

हाशिये जीवन के
हिसाब बन गए
जब हम खामोश हुए
खुली किताब बन गए

जो चले थे मैंने यू हीं
बे रज़ामंदी के कदम
वो ही मेरी जिंदगी के
असली जवाब बन गए

हाशिल हुआ है मुझे
कालिख और धुआं
मेरी रूह जलाकर औरों के
घर चिराग जल गए

चीखते हैं खामोश
दरवाजे मेरी मन के
मंजिल को रुकशत कर
कदम कहीं ओर निकल गए

मन है की मोहब्बत का
प्यासा है बहुत
किसी जनाजे में रोये
कभी हशीँ से पिघल गए

मैं आहटों से अक्सर
रोज चौकता हूँ
जाने कौन हो दरवाजे पर
अपनों से मिलने के लिए

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