जहाँ अपने गीतों के माध्यम से

जहाँ अपने गीतों के माध्यम से
मूल्य और परिचय न लिया जाता हो
जिस सभा में गीत सुनने के बाद
कोई हँसी-रूदन नहीं करता हो
जहाँ विश्व भर के कवियों में
कोई भिन्नता नहीं होती हो
जहाँ भावनाओं की उड़ान
केवल तुझ पर केन्द्रित रहती हो
हे मेरे पिता! उस विश्व सभा में
मुझे आमंत्रित कर, बुला ले!
मेरे अनकहे गीतों को वहाँ
गर्व से मुझे गाने दे, सुनाने दे!

‘ श्रीज्ञानमंजरी – 40 ‘
– नीरज सारंग

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