तह्जीबे इल्म

काबिज़ नहीं रंगे वफ़ा
चिकनों के चेहरे पर
छदम भेष वाला कभी
मुसाफिर नहीं होता

कदम सोच कर रखना
खातून के कमरे में
हर चाहने वाला
तेरा मुहाफ़िज़ नहीं होता

दामन भरोसे का भी
लूट लेते हैं निगेबान
साथ बैठने वाला क्या
काफ़िर नहीं होता

रूह को अपनी रख
फानूश के दरमियाँ
हर लूटने वाला यहां
मुहाजिर नहीं होता

बड़ी नाजुक सी हो गई है
अब साख जीवन की
कितना और धड़कना है
दिल परवाह नहीं करता

कुछ तो भरोसा है
तह्जीबे इल्म पर
वरना यूं कदम “राकेश”
डर डरकर नहीं भरता

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