“मेरी माँ गंगा”

“मेरी माँ गंगा”

गंगा निर्मल, उज्जवल, धवल और है पापनाशिनी |
तन की मलीनता को दूर करने वाली ||
गोमुख में आंखियां वो खोले , हरि के दर पर शैया |
वाराणसी में स्नान करके, प्रयाग में चले मैया मैया ||
तन उज्जवल मन निर्मल है हरती सबकी पीड़ा |
पथ पर अपनी सखियों संग करती है क्रीड़ा ||
भागीरथी है, भगीरत की निशानी |
कोमल है ममतामयी, माँ ये सियानी ||
पटना से निकालकर यात्रा कलकत्ता में होती है पूरी |
जिसकी मनोकामना है अधूरी , हो जाएगी पूरी ||
दूषित कर कलो ने इसको कृष्ण बनाया है |
अपने पैरो पर कुल्हाड़ी का ज़ोर चलाया है ||
आरती गाउँ, ढोल बजाऊं , बजाऊं मैं मृदंगा |
प्रेम करती प्रतिपल ये मेरी माँ गंगा ||

— अर्पित कौशिक