सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर

सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर
आस्था का मलबा
विश्वास को ढाह कर
चैन की नींद ली
सरयू को किया लाल
और जयजयकार किया हमने।
बरसों की आस्था
पल में मटियामेट
जयजयकारा में खो गया
मेरा दोस्त अब्दुल
चच्ची के साथ रातों रात नदारत
आज भी आंखों में लोर लटकी ढूंढती है चच्ची की उदास पलकें।
रात बिरात नींद में आता है अब्दुल
पूछता है एक ही सवाल
यार मेरे से क्या ख़ता हो गई
उस शाम हमारा बचपन खो गया
तलाशता हूं तुम्हें हनुमान मंदिर के प्रसाद खाने के लिए आज भी जब गुजरता हूं किसी मंदिर के सामने से।
याद है पप्पु!
डिहवार बाबा पर चढ़ते मौरी को साथ नोचते झगड़े नहीं
उस दिन क्या हुआ कि हम गैर हो गए
मुकुवा बाबा आज भी याद आते हैं
हर शाम जब मिसरी दिया करते,
आंख मिचते डिहवार बाबा पर चढ़ी अगरबत्ती चुराते हम साथ होते
कहां चले गए पप्पु?
मैं उसी शाम खो दिया अब्दुल
गुम हो गई चच्ची
कहां चली गई मरियम
बार बार सरयू को खंघालता हूं,
पहाड़ों की छाती भी खखोरता रहता हूं
पर कहीं भी तो नजर नहीं आता वह खंड़हर,
वो जमीन जहां हम बच्चे हुआ करते थे।

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