‘इच्छाएं एवं भावनाएं’

वैकुण्ठ:द्वार निर्मल,धर्मराज की साधना।
समता सा संस्कार सजे,सफल सकल कामना।।
बैठे बैकुंठ द्वार ले लिखने को रंग-ढ़ंग।
पढ़ने दु:ख-सुख शोक,नर्क लोक को संग-संग।।
गढ़ने चले मानुष,व्यापक व्याप्त बाजार।
जोखिम जहाँ किनार,त्रिभुवन सनातन तंग-तंग।।
व्यथित जटिल गतिशील,प्रशासक प्रशासन जंग।
पढ़ने दु:ख-सुख शोक,नर्क लोक को संग-संग।।
ले॰कूण्ट्ज व ओ डोनेल,हेनरी फेयोल दंग।
लूथर गुलिक लिंडाल उर्विक?नियोजन नियन्त्रण तंग।।
मजदूरी माफिक मासिक,बैकुण्ठ से बाटेंगे।
हैल्से रोवन टेलर,गैन्ट इमर्सन ડ नापेंगे।।
मजदूरी मुकम्मल दे,बैकुण्ठ से भाँपेंगे।
बुद्धिमान श्रेष्ठ शक्ति,सन्तुलित संतुलन नाँपेंगे।।
सम्बन्ध स्नेह सुगम सुन्दर,पर नर्क लोक नापेंगे।
मास्लो क विचार धारा,अधॉयन अत्यन्त ऑकेंगे।।
समता सा संस्कार सजे,सफल सकल कामना।
वैकुण्ठ: द्वार निर्मल, धर्मराज की साधना।।
नोट:-हैल्से,रोवन,टेलर,गैन्ट,इमर्सन,की यह सब योजनाएँ हैं।अ-टेलर-भिन्नक कार्य योजना है।आ-गैन्ट की कार्यभार एवं अधिलाभांश योजना।
इ=इमर्सन-कार्यક્ષमता अधिलाभांश योजना है। मास्लो-अमरीकी मनोवैજ્ઞાनिक अब्राहम मास्लो ने 1943 में अभिप्रणा की आवश्यकता-क्रमवद्धता विचारधारा का प्रतिपादन किया। उसका कहना है कि मनुष्य एक इच्छाधारी प्राणी है। उसकी आवश्यकताएं बहुविध,जटिल,
अन्तर सम्बन्धित और सदैव परिवर्तनशील होती है। वे कहते हैं कि सिर्फ असन्तुष्ट आवश्यकताएं ही व्यक्ति को अभिप्रेरित करती हैं
और मानवीय आवश्यकताएं महत्ता की क्रमवद्धता में व्यवस्थित होती हैं जैसे ही निम्न स्तरीयआवश्यकताएं संतुष्ट हो जाती हैं वैसे ही
उसके आगे की आवश्यकताएं जाग्रत होती हैं और उन्हें सन्तुष्ट करने का प्रयास किया जाता है।[पृष्ठ112,प्रतियोगिता साहित्य सीरीज:वाणिज्य2010] 

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