ये कैसी आजादी आयी

ये कैसी आजादी आयी,
घर घर में दुख-चिंता छायी ।
मात-पिता का आदर छोडा,
डिस्को पब से नाता जोडा ।।
जीवन के हर पहलू को है,
अंग्रेजों की ओर है मोडा ।
भूल गये वो आजादी के,
लिये बडी कुर्बानी को ।
सिगरेट शराब और पार्टी सब हैं,
घर छोडा रोती मांओ को ।।
झोंक दिया अब जीवन सारा,
टीवी, सिरियल और गानों में ।
बचा समय जो थोडा-मोडा,
मोबाईल लिये हैं राहों में ।।
ये कैसी आजादी आयी,
घर घर में दुख चिंता छायी ।
बढते खून,
और रेप कहीं तो कहीं दुखी अब नारी है ।
कहीं फैशन के चक्कर में,
कम होते कपडे भारी हैं ।
अश्लील हरकतें गली गली हैं,
गंदे अश्लील चलचित्र भरे ।
कहाँ गयी वो झाँसी रानी,
पद्मावती महारानी है ।
इज्जत की खातिर जौहर किन्हा,
हार ना मानी गद्दारों से ।
पर उन अंग्रेजों,
मुगलों की आज फिर कहीं गुलामी है ।
जात-पात कोई धर्म ना माना,
इज्जत बिकती बाजारों में ।
ये कैसी आजादी आयी,
घर घर में दुख चिंता छायी ।
बडे बडे होटलों में मिलती,
इज्जत घर की भाई है ।
कसूर किसि का नहीं भाईयों,
अश्लीलता आँधी भारी आयी है ।
कौन करे अब चूल्हा चौका,
रंगोली त्यौहार सब भूले है ।
पर फैशन में खर्च कर रहे लाखों-करोडों झोंके है ।
कहीं न रोटी एक वख्त की,
कहीं व्यंजनों की लाईन है ।
आज भूल गये हम लाज घरों की ये कैसी आजादी आयी है ।
ये कैसी आजादी आयी है,
ये कैसी आजादी आयी है ।

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