कविता

अपरिमित,अथाह,असीमित,
अंधकार,निस्वर,अनिर्मित,
पूर्ण प्रलय से
पूर्ण सृजन का
होने लगा विस्तार।
दीर्घ मौन की
रूद्र चक्षू से
सृजित हुआ संसार।

चकाचौंध सी अंधकार मे,
फैल गयी क्षण भर में।
तुल्य नहीं असंख्य कोटि में,
तुल्य नही गण भर में।
अविरल,अगण्य,असमान,अस्थिर,
तत्व जागे फिर निद्रा से चिर ,

हुआ शान्ति मे रूद्र शोर
जग ने देखा नव एक भोर।

कल्प सृष्टि में अल्प ज्ञान में,
नभ असंख्य मे रश्मि समान मे।
कोटि रवि के भीष्म प्रकाश में ,
शिव है समाहित हर एक स्वास मे।

कर निस्तारण शांत रूप का,
रूप एक महाकाल लिया है।
नभ पूरा मस्तक पर हैं,
और चंद्र चूड मे भाल लिया है।
भस्म शरीर सुशोभित होती,
भूतरूप विकराल लिया है।
हो दिगम्बर शिव शंकर ने,
भूत भविष्य संभाल लिया है।

ॐॐ के दिव्याक्षर मे ,
सम्पूर्ण सृष्टि को ढाल लिया है।

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