एक खामोश सा अफसाना (ग़ज़ल )

एक खामोश सा अफसाना (ग़ज़ल )

एक खामोश सा अफसाना लहरो पे लिखा होता
न लबो से तुमने कहा होता, न हमने सुना होता

हवाओ में घुलती शोख़िया, महकता मौसम होता
न किया तूने इजहार होता,न हमारा इकरार होता

ख्वाबो खयालो में गुजरता अपना वक्त होता
न तुम बेपर्दा होते,न हमने दीदार किया होता

गुलशन में होती बहार,फूलो के किया चर्चा होता
उनमे एक नाम तुम्हारा होता, एक हमारा होता

रात की ख़ामोशी चाँद ने सितारों को सुनाया होता
वो किस्सा कुछ तुम्हारा होता कुछ हमारा भी होता

बारिश के साथ गरजी बिजली से संगीत बना होता
वो बनायीं ताल तुम्हारी होती,और सुर हमारा होता

एक खामोश सा अफसाना लहरो पे लिखा होता
न लबो से तुमने कहा होता, न हमने सुना होता

***डी. के. निवातियाँ ***

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