अगर ये लिबास है बदन तो

अगर ये लिबास है बदन, तो धडकने भी आज़ाद नहीं
तु साथ है सजन तो, क्यु मुझे अहसास नहीं
सच से सच और झुठ से झुठ का, मातम कब होगा
मेरे मर मिटने ये बहाना नहीं

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

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