कलयुग की माया ( भाग दो )

कलयुग की माया ( भाग दो )

कुत्ते खाते दूध मलाई,गौ माता को मिलती घास नहीं
गीदड़ बन गए वनराज यंहा, अब घोड़े खाते घास नही

जींस पहन के नारी रहती, आँचल का पल्लू पास नही
माँ की गोद को तरसे बच्चे, वक्त किसी के पास नही

दारू पीते घर के मालिक, बच्चे को दूध की आस नहीं
मांस मदिरा के आदी हो गए,शर्बत किसी को रास नही

फ़िल्मी गाने सब है रटते,भजन आरती अब याद नही
ढोंगी बाबा घरो में पुजते मात-पिता की अब याद नही

चोर उचक्के नेता बन गए, झूट सच की बात नहीं
नीरे अनपढ़ देश चलाते जिनकी घर में औकात नहीं

संग संग चलते एक दूजे के, फिर भी कोई साथ नही
अपने घर में डर लगता है, बचने की कही आस नही

कैसा ये जमाना आया जीने में अब रास नही
कलयुग की माया देखो इसमें कोई पाक नही

—-::: डी. के. निवातियाँ :::——–

3 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/09/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/12/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/12/2017

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