कुछ पल बिसरे हुए

बंधे ये लफ्ज हैं सारे, बंधी हैं हरकतें सारी ।
कसा शिकंजा सांसों पर, चलती है नब्ज भी भारी ।।
इश्क ये लूट लेता है जहाँ की सारी ही खुशियाँ,
चलता है नींद में आशिक़, देखने मासूका प्यारी ।।

तमाशे इश्क के पहलूँ, जो आशिक खूब करते हैं ।
बदलियाँ रखकर अश्कों में, बहाने से कतरते हैं ।।
तड़पा के खूब रखते हैं, तड़पने से भी डरते हैं ।
जिस्म से जान ले कहते, तुझी से प्यार करते हैं ।।

ऐ हुस्न की मल्लिका, मेरे ख्वाबों में न आया करो ।
अपने इन कातिलाना जलवों से, हमें न भरमाया करो ।।
आंचल से इस कदर ढको ये अपना रेशमीं बदन,
जमाना है बड़ा जालिम, इस रूप को अक्सर छुपाया करो ।।

अपनी मोहब्बत को मेरी मोहब्बत से आजमाँ ले तू ।
गहराई अपनी मोहब्बत की, मुझ से छुपा ले तू ।।
ये मेरे अश्क एक दरिया को डुबा सकते है ।
डूब तो जाएगी ही हो सके तो खुद को बचा ले तू ।।
तेरी मेरी जंग का बस, अब एक ही इलाज है ।
खुदा को मना के कैसे भी, मुझे अपना बना ले तू ।।

अरुण जी अग्रवाल

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