अब भी वो मगरुर बहुत हैं-गजल-शिवचरण दास

अब भी वो मगरुर बहुत हैं
आदत से मजबूर बहुत हैं.

इतने पास हैं गैरों के हम
अपनो से ही दूर बहुत हैं.

नजर बचा कर चले गये वो
दिल के शीशे चूर बहुत हैं.

दूर वतन से अपने जाकर
लोग वहां मशहूर बहुत हैं.

रिश्ते नाते सब बन्धन हैं
फूलों मे ही शूल बहुत हैं.

अपने गम तो भूल गये हम
दुनिया के नासूर बहुत हैं.

रोज बरसती हैं अब आंखें
सावन के दिन पर दूर बहुत हैं.

दास हमारी है मजबूरी
खट्टे ये अंगूर बहुत हैं.

शिवचरण दास

One Response

  1. rakesh kumar rakesh kumar 28/11/2014

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