कलयुग की माया ( भाग एक )

कलयुग की माया ( भाग एक )

झूठ यंहा पर हुंकार भरे है, पाप पुण्य की बदली काया I
योगी बन गए सारे भोगी,देखो कैसी कलयुग की माया II

इंसानो से अब भूत डरे है, बेईमानो के यंहा रहती माया I
लक्ष्मी कुबेर दास है उनके, जिसने उनका मान घटाया II

ज्ञानवान सब नौकर बन गए, जड़बुद्धि ने डेरा जमाया I
चोर-डाकुओ ने साधु बनके, दुनिया में है नाम कमाया II

पंडित बन गए मांसाहारी, मुल्ला पीरो ने जाम उठाया I
मंदिर मस्जिद पार्क बने है,चौराहो पे ईश पूजता पाया II

गंगा यमुना बन गए गंदे नाले, पानी की बदली काया I
पीने को नही मिलता पानी, दूध नाली में बहता पाया II

कोई तरसता दाने- दाने को, किसी की भूखे पेट पाया I
गोदामो में सड़ता अन्न, कही कूडो में भोजन गिराया II

बेटी माँ को दोष धरे अब, बाप को बेटे से पीटता पाया I
छोटे बड़े की लाज नहीं, संस्कारो ने अस्तित्व गवाया II

रक्षक बने है घर के भक्षक,पुलिस को चोरो से डरता पाया I
ईमानदार यंहा सजा पाता, बेईमानो को पुष्पहार पहनाया II

भाई को भाई रास नही अब, दुश्मनी ने पहरा जमाया I
नही किसी का रहा भरोसा, चौकीदारी ने माल उड़ाया II

घर के बूढो की हुई दीनदशा,पत्थरो को पुजते पाया I
धर्म कर्म के नाम यहाँ, गोरख धंधो को चलते पाया II

नारी का सम्मान नही अब, मान सरेआम लुटते पाया I
सम्बन्धी अब करे वरन , ऐसी कलुग की बहती माया II

—-::: डी. के. निवातियाँ :::——–