घर बुलाना उसका

आसान न था मुझे
घर जाना उसका
वो निकले तो लगा तन्हा मैं
हो गया पूरा जमाना उसका

माँगने तो गए थे दूध
दरवाजे पर उसके
मयखाना पिला गया
अदबी सर झुकाना उसका

कशूर सिर्फ आँखो का
नहीं था ,सितम था
बाल गालों पर
आ जाना उसका

सहमे सहमे से वो
निकले इस कदर
मन लुभा गया
पल्लू दबाना उसका

रोज ही देखकर मुझे
वो पलटते थे
अपना बना गया
कदम डगमगाना उसका

अधमरा करने पर भी
ना आया उन्हें रहम
मार ही गया फिर
घर बुलाना उसका

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  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 29/11/2014

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