मैं बहना चाहता हूँ

मैं पानी की तरह
अविरल बहना चाहूँ
निकल कर पत्थरों से
मृदुचल चलना चाहूँ

कोई जो लाठी अड़ाए
उसे प्यार से सहलाऊँ
अपनी सूरत की परछाई
उसको मुझमें दिखलाऊँ

शीतल बनु इतना की
हर की प्यास बुझा सकूँ
पहाड़ों का चीर सीना
राहें अपनी बना सकूँ

हर रंग घुल जाए मुझमें
सबको लेकर साथ चलूँ
कभी आशमान चढ़ जाऊ
कभी जमीन की बात करू

केश सुमन बनू शंकर का
गंगा बन धरती पर आऊँ
गाथा लिखूँ शादियों की
और गंगाजल कहलाऊँ

गन्धर्व, किन्नर कोई कुपोषित
बड़े प्यार से नहलाऊँ
चुना जाऊं पत्थ्ररों मैं
मंदिर मस्जिद बन जाऊं

मैं बहना चाहता हूँ
और बस बहता ही रहूँ
कभी जम जाऊं पर्वत शिखर पर
कभी कभी बरसात करूँ

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 29/11/2014
  2. rakesh kumar rakesh kumar 07/12/2014

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