पुरानी तस्वीर

अब अक्ल आई कुछ
किताबें पढ़ने की
जब उम्र हो गई ,भाई
हमारी पचपन की

सकून अब आया है
आत्मा के हजूम को
ठिकाना ना मिला इस
दिल महरूम को

कोई बेबशी हमारी
तौल सकता है क्या
थोड़ी सी राहत चुराकर
जीवन में घोल सकता है क्या

कुछ अहं में गवां दिया
और कुछ इन्तजार मैं
काफिले बगल से गुज़र गए
ना फर्क आया रफ़्तार मैं

मंदिर ,मस्जिद की तरफ
हम बस ताकते रहे
कर्म की उम्र में हम
फतवे बांचते ही रहे

पूछते है लोग राज़
तस्वीर पुरानी का
धूल हटाकर बोलतें हैं
क्या किया भरी जवानी का

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