मन मंदिर है

मन मंदीर है, प्रेम है; पुजा अर्चना जानलो
जुस्तजू दिल की आँखो में जान लो

प्यार लफ्जो में बता नहीं सकते
दिल की बाते अक्सर बता नहीं सकते
जो प्रकट ना हो प्रीत अमर है जान लो
जुस्तजू दिल की आँखो में जान लो

रात आती है, जाती है; हम नहीं होते
दिन गुजर जाते, पर यकिन नहीं होते
जो विकट ना हो रीत अमर है जान लो
जुस्तजू दिल की आँखो में जान लो

कौन रोता है, कौन हँसता है; मेरे भीतर
कौन जीता है, कौन मरता है; मेरे भीतर
जो विगत ना हो गीत अमर है जान लो
जुस्तजू दिल की आँखो में जान लो

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

Leave a Reply