मय भी हो तो इतनी हो

कभी देवों से डरता हूँ
और कभी इंशानों से
कभी मरघट से डरता
कभी ऊँचे ऊँचे मकानो से

रंज रजा से रखता हूँ
बड़े बड़े शैतानो से
मोहब्बत करता मयखाने से
डरता हूँ पैमानों से

कोप भाजित चित्तवृत्ति
वक्रदृष्टि फरमानों से
नहीं सोया हूँ जी भरकर
बीते कई जमानो से

रुधिर रूप धरते हैं आंशू
किये गए अह्शानो से
बेचना खुले बाजार खुद को
जी भर गया तहखानो से

मंजूर नहीं जुमलों में जिंदगी
अब कुछ कम अफ्शानो से
मय भी हो तो इतनी हो
मांग पीऊं आँख दीवानो से

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 24/11/2014
  2. rakesh kumar rakesh kumar 26/11/2014

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