मुक्तक

कदाचित मुझ अकिंचन की बात को सुन लिया होता |
परम पावन प्रणय अर्चन विधा को चुन लिया होता ||
ऋचाये रूप कविता का धार करके जो निकलीं थी |
कभी किंचिद ध्यान देकर कवित को गुन लिया होता ||

सजा सच बोलने की मौत देते है सनम मेरे |
हमारी लूट लीं खुशियाँ किये है नाम गम मेरे ||
हुआ है पस्त सच मेरा पराजित है नहीं अबतक |
सनम को भी उजड़ना है ये सच या हैं भरम मेरे ||

न सालों साल चलते हैं बिना कारण कोई किस्से |
खुले बाजार कितने है खरीदूं चाहे जो जिससे ||
बिना सुलझे सवालों में कोई उलझी कहानी है |
जगा दी शायरी तुमने कहूं मैं हाय किस किससे ||

तुझे पत्थर कहूं जो तो प्रभू पत्थर में होता है |
भगत जब भी दुखी होता तो रब भगवान् रोता है ||
किया बर्बाद मुझको है मरूंगा मैं तड़प कर अब |
बिना दिल की नहीं है तू कहाँ दिल तेरा सोता है ||

मुहब्बत में तड़प करके मरे हम तो है कुर्बानी |
समाई कृष्ण में मीरा हुई थी कृष्ण दीवानी ||
कोई मोहन प्रणय मीरा से कर के प्राण तज देगा |
हुई मगरूर अब मीरा मुरारी जान है जानी ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

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