चाणक्य गीतिका:-खण्डकाव्य

चाणक्य गीतिका:-भाग-1(मातृ वंदना)
कवि;-अनमोल तिवारी
****श्री*****
सौम्य शिखर हिम अतुल जहा,
उत्तर की पवनें ठंडी हैं।
परचम अपना फहराती वो,
भारत भूमि अखंडी हैं।।
पारावार जो अपार जल से,
इसके चरणों के धोता हैं।
दीव जन्म भी जिस भूमि पर,
बड़ा ही दुर्लभ होता हैं।।
इसके कण-कण की शौर्यता का,
मैं कहाँ-कहाँ गुणगान करूँ ?
नमो-नमो! हे मातृभूमि,
वन्दन में अपना शीश धरूँ।।
हे ! बुद्धि की दात्री माँ,
मेरे सुर में आशीष भर देना।
कर सकूँ एक सृजन नया में,
सेवक पर कृपा कर देना।।
आर्याव्रत की गाथा का,
एक लघु अंश में लिखता हूँ।
मगधपुरी के राजमहल से,
नूतन पटाक्षेप करता हूँ।।