बोरियत जिन्दाबाद- (हास्य-व्यंग्य)-विनय भारत के हसोड व्यंग्य

बोरियत जिन्दाबाद- (हास्य-व्यंग्य)

बोरियत ………… बोरियत………. बोरियत……….. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इस बोरियत नामक शब्‍द को जीरो से गुणा कर दूं। पर फिर सोचता हूं कि ये काम भी तो ऊबीला है। बोरियत सभी को होती है, कारण है कि हम फालतू होते हैं तो सभी को फालतू समझते हैं। इस बोरियत से बोर होकर मैंने भी कुछ करने को सोचा। एक सब्‍जी वाले के पास गया, मैंने कहा कि आलू है क्‍या? वो बोला नहीं, ये बैंगन ले जाइये। मैंने कहा, जब आलू ही नहीं है तो बैंगन का क्‍या करूंगा? वो बोला, बैंगन ले जाइये, घर जाकर सब्‍जी बनाइये, पसंद ना आने पर रोटी के साथ सब्‍जी दे जाइये।

पहले ही सब्‍जी खरीदने का बोरियत सा काम कर रहा था, इसके बाद फेसबुक चलाने बैठा, वहां देखा कि कुछ मस्‍तीली लड़कियों की फोटो, कुछ हंसीले चित्र, कुछ पगलू से कमेंट पड़े हुए थे। उन्‍हें देखकर फिर बोर हो गया, फेसबुक पर भी कुछ खास नहीं किया जा सकता। पर क्‍या करें, टाईम पास तो करना था, सो कुछ कोल्‍ड ड्रिंक लाया, उसमें कुछ नमक मिलाया और पी गया। कुछ देर बाद नींद लग गई। हीरोईनों के सपनों में खो गया….. कभी उहलाला……….. तो कभी मैं लाला, कभी मुन्‍नी बदनाम…… तो कभी शीला जवान… अब तो छोकरा भी जवान हो गया, छोकरा सपने में आते ही नींद खुल गई, क्‍योंकि ऐसा लगा कि इससे अच्‍छा तो कोई भूतनी देखे लेते, कम से कम फीमेल तो होती, अब गुस्‍सा आया तो कुछ लिखने बैठ गया। ऐसा लिखा, ऐसा लिखा कि क्‍या कहूं, अब जो लिखा वो तो आप पढ़ रहे हैं, पढ़कर बोर हो रहे हैं, मुझे भी पता है कि आप मुझे गाली देंगे, लेकिन ये भी बोरियत का एक काम है।

मैंने नल से पानी भरा, नल में से एक सॉप निकला, लेकिन मुझे डसा नहीं। मैंने पूछा कि अबे डँसता क्‍यों नहीं, वो बोला कि आज के जमाने में इन्‍सान ही इन्‍सान को ड़स रहा है तो फिर मैं अपना जहर क्‍यों बर्बाद करूं।

अब तो बहुत ही ज्‍यादा बोरियत की हद हो गई थी। वैसे बोर होना भी एक काम है, क्‍योंकि बोर होने के लिए आपके पास समय होना चाहिए, आपका दिमाग शैतान का घर यानी खाली होना चाहिये, तब जाकर कुछ बोरियत के लम्‍हे बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। बोर होते-होते पास के मैदान में गया, वहॉ देखा, कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे तो कुछ फुटबाल। क्रिकेट भी अब फालतू हो गया है। देखने बैठे तो कोई गेंद फेंक रहा है, कोई बैट उठा रहा है। ऐसा लगा कि किसी विशेष महायुद्ध की तैयारी हो रही हो और बॉलर गेंद की जगह बम फेंक रहे हो तथा सामने शत्रु सेना बैट रूपी ढ़ाल लेकर खड़ी हो और बम को बीच रास्‍ते पर ही दूसरी ओर उछाल रही हो। स्‍टम्‍प जैसे किसी राजा का महल हो, जिसको बचाने के लिए एक महायुद्ध बड़े पैमाने पर चल रहा हो और बेचारे दो बेट्‌समैन अकेले ही गुरू गोविन्‍दसिंह के सवा लाख से एक लड़ाउं वाले नारे को सिद्ध कर रहे हैं।

कुछ खास ना लगा, लेकिन फिर नींद आ गई। आखिर हम भी पक्‍के निंदोकड़े थे। इस बार देवलोक देख रहे थे। सामने देवराज इन्‍द्र का आसन, पास में एरावत हाथी और दरबार में मैनका आदि के नृत्‍य देखकर ऐसा लगा जैसे पृथ्‍वी के किसी डिस्‍कोबार का दृश्य सामने आ गया। पर आश्चर्य होता है स्‍वर्ग की कार्यप्रणाली देखकर कि मनुष्‍य यदि बार में जाकर नाचे, शराब का सेवन करे तो पाप है लेकिन देवता लोग रम्‍भा आदि का नृत्‍य देखें और मस्‍ती करें, ये पुण्‍य है। पर देवलोक से हमें क्‍या मतलब, उनकी लीला वे जानें, अतः नींद खुल गई, क्‍योंकि मेनका के नृत्‍य के बाद वरूण देव नृत्‍य करने लगे। हम बोर होते-होते कुछ लिखने बैठ गये।

खैर! बोरियत महसूस कर रहा था, मैंने सोचा कि मैं अकेला ही बोर क्‍यों हूं और सभी क्‍यों बोर नहीं है? इसलिए ये लेख लिखा ताकि आप भी इस बोरियत का फायदा नुकसान देख सकें। इस लेख को बार-बार पढ़कर बोर होइये, सिर खपाइये और ज्‍यादा गुस्‍सा आये तो खोपड़ी दीवार पे दे मारिये। आपकी टेन्शन खत्‍म और आपको देखकर यमराज की टेन्शन शुरू। सब टेन्शन ही खत्‍म, फिर भी कुछ न हो तो मुझसे कहिये, ऐसे दो-पॉच लेख और भेज देता हूं। कसम से ……. दोबारा बोर होने की कोशिश नहीं करेंगे

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