‘‘वैशाख का सूरज” (हास्‍य व्‍यंग्‍य)- विनय भारत के हसोड व्यंग्य

‘‘वैशाख का सूरज” (हास्‍य व्‍यंग्‍य)

गधा अर्थात्‌ वैशाखनंदन या यूं कहें तो वैशाख का चमकीला सूरज, ऋतुप्रेमी, सीधा साधा मूक सा जानवर।

गधे की जितनी प्रशंसा करें उतना कम। जब भी गर्मी का मौसम हो और जोरदार शंखनाद जैसा क्रमशः साउण्‍ड सुनाई दे जिससे कान के सभी वाद्ययंत्र बजने लगे तो समझिए वैशाखनंदन महोदय आस-पास हैं। प्रकृति ने यदि कोई निरा भोला जानवर बनाया है तो वह है गधा। गधे का स्‍वभाव सरल होता है, इसकी सरलता का पता इस बात से लगता है कि गाँव के बच्‍चे कभी इसके कान मोड़ते हैं तो कभी कोई पीठ पर चढ़कर अश्व आरोहण का सुख प्राप्‍त करते हैं। लेकिन यह सरलबुद्धि जीव सभी को समान भाव से देखता है। वहीं दूसरी ओर घोड़ा हमारे भ्रष्‍ट नेताओं की तरह अड़ियल होता है, जब तक चने की दाल रिश्वत में ना लें, तब तक अड़ा रहता है और कोई कार्य नहीं करता। लेकिन परम दयालु और कृपालु जानवर गधा भूखा रहकर भी काम पर निकल जाता है। मैं ये कहता हूं कि जिसने जीवन में वैशाखनंदन की पीठ-यात्रा नहीं की तो क्‍या फायदा जीने का, उसने उसी प्रकार से यह सुअवसर खो दिया जैसे किसी ठेकेदार से कोई सड़क निर्माण का ठेका मिलते-मिलते हाथ से निकल गया हो।

वर्तमान में इस परम निराले पशु के साथ उसी प्रकार से अन्‍याय किया जा रहा है जैसे भ्रष्‍ट नेता पर ईमानदारी का आरोप लगाया जा रहा हो। किसी की शादी में जाना हो तो घोड़ा याद आता है, किसी को रथ यात्रा करनी हो तो घोड़ों को याद किया जाता है। गधे की जिंदगी ऐसी है जैसे कार्यालयों में गरीब व्‍यक्‍ति द्वारा रिश्‍वत देकर भी काम न बने और वो ऑफिसों में अपनी चप्‍पलें चमकाता रहे।

घोड़ों को छोड़ श्‍वान पर आते हैं। श्‍वान के वर्तमान में पॉचों पंजे घी में और सर कड़ाही में है। जिन लड़कियों की झलक पाने के लिए हजारों लीटर पेट्रोल फूंका जाता है, उन्‍हीं लड़कियों के पास श्‍वान नामक जीव बड़े सम्‍मान के साथ बैठता है। ऐसे में गधा मानवों से श्रेष्‍ठ है। उसके साथ अन्‍याय करना गलत है। मानव गधों का चारा डकार जाता है लेकिन गधा कभी मानव के भोजन पर नजर नहीं डालता। गधा ऐसा जीव है जो भोजन करके सिंहनाद करता है और ईश्वर को चिल्‍ला-चिल्‍लाकर भोजन के लिए धन्‍यवाद देता है, जबकि मानव ईश्वर को केवल संकटों में याद करता है। वैशाख शुरू होते ही यह नाचना शुरू कर देता है जबकि मानव चुनाव के दिनों में ही नाचता है। गधे की दुलत्ती बड़ी कष्‍टप्रद होती है। ये उन मानवों के लिए है जो चुनाव के दिनों में हाथ जोड़ता है और चुनाव के बाद बड़े-बड़े घोटाले करता है, पेट्रोल, गैस पर पांच रूपये से पच्‍चीस रूपये तक बढ़ाता है लेकिन जनता के आक्रोश पर मात्र सत्‍तर पैसे कम करता है। ऐसे सेवाभावी मानवों का स्‍वागत गधे की लात से होना चाहिए।

वर्तमान में ऐसे भ्रष्‍ट नेताओं का स्‍वागत जगह-जगह फूल मालाऐं डालकर किया जाता है। इनका स्‍वागत करने की अपेक्षा यदि उस सरल जीव गधे का स्‍वागत दो पुष्‍प चढ़ाकर किया जाये तो अच्‍छा है। गधा हमें कुछ लाभ तो देता है और नोट-वोट की राजनीति से भी दूर रहता है। खैर! हम तो लेखक है, ऐसे ही कलम घसीटते रहते हैं। लेकिन ये जानकर कभी-कभी प्रसन्‍नता होती है कि अभी कुछ लोग सजग हैं, जो फूल मालाओं की जगह थप्‍पड़, चप्‍पल, जूते का प्रयोग कर रहे हैं। असली फूलों के हकदार और दबंग पुरुष तो वे ही हैं जो गधे और भ्रष्ट नेता में अंतर समझकर अपनी वीरता हाथ-पैरों से प्रदर्शित कर रहे हैं।

॥जय हिन्‍द जय भारत॥

लेखक

विनय ‘भारत’

दशहरा मैदान, गंगापुर सिटी

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