सब देखते रहे

गुरू तो शिष्य से भी सीख लेते है
और सम्राट, प्रजा से भीख लेते है

हवाओं से बाते करना, मजाक नहीं है
वरना तोते भी अच्छा चीख लेते है

दिन दहाडे मार डाला, सब देखते रहे
चलो; और एक कुर्बाणी, कायरो के नाम लिख लेते है

ज़ुकाम काफी है, ज्ञान पाने के लिये,
सत् उतर आता है, जब भी छींक लेते है

मन की मुरादो का, कोई नहीं सानी
तारें पकडते हम, कहा हम दिक लेते है

दिल की दुकानो का, समा अज़ीब होता है
खरीदार हो ना हो, मगर हम बिक लेते है

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

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