नजरो से पीता हूँ (ग़ज़ल)

जब भी पीता हु मैं उसकी मदमस्त नजरो से पीता हूँ I
शबनम की बूंदो में झिलमिलाती सूरत को देख जीता हूँ II

छूता लेता हूँ ख्वाबो में कभी उसके मलमली हाथो को I
उतर आती है तस्वीर हूबहू यार की जाम जब पीता हूँ II

उठता है गर्म धुआं दोनों तरफ, जब जज्बात सुलगते है I
दहकते हुए दिलो मैं अरमानो को बस हवा दिये जाता हूँ II

कैसे रोशन हो यंहा पर अब, चिराग-ऐ-मोहबबत का I
जलने से पहले दुनिया के हाथो, बुझा दिया जाता हूँ II

आती है याद उसकी उल्फत मैं, आँखे झुका लेता हूँ I
समझ कर जाम अपने ही अश्को को शौक से पीता हूँ II

मुझ मैं बसा है मेरा यार अभी मुझे तनहा न समझो I
राख हो गया हूँ फिर भी, लाल अंगार सा धधकता हूँ II

जिन्दा हूँ जब तलक मैं इस जहाँ मैं बड़े शान से जीता हूँ I
चल निकला हूँ लेके नेक इरादे जमाने से बेख़ौफ़ जीता हूँ II

करे नफ़रत लाख ज़माना हमसे, तो कोई बात नहीं I
बस रहे नजरे इनायत खुदा की, ये इल्तिजा करता हूँ II

जब भी पीता हु मैं उसकी मदमस्त नजरो से पीता हूँ I
शबनम की बूंदो में झिलमिलाती सूरत को देख जीता हूँ II

—::—डी. के. निवातियाँ —::—

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