जाम चढाये कितना

जाम चढाये कितना, अंजाम न आए कोई
होश बढाये कितना पैगाम न आए कोई

जुस्तजु हो गयी मजार दिले- बेकसी की
एक ताज और बनाता, मकाम न आए

कोई लीखे कैसे,कोरा कागज हो गया मैला
एक राज और सुनाता गुमनाम न आये कोई

बेसूद हो जहा अपने, बेगानो से झुठी आशा
जा रहा है जनाजा अकेले ही, अवाम न आये कोई

आखे वो बुझ गयी जीस का नुर बनता
तमाशा दिखाकर भी जहा से सलाम न आये कोई

जलु भी तो कैसे शम्मा बुझ रही है बस
दिल चुराने का मुझ पे इल्जाम न आए कोई

रचनाकार/कवि~ धिरजकुमार ताकसांडे

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