सबला नारी


सबला नारी

भोर के प्रथम प्रहर से
शुरू होती है दिनचर्या
तिल-तिल तन-मन हार
दौड़ती उसकी जिंदगानी !! (१)

किसी के लिए माँ बनीं
बनीं किसी की बहूरानी,
एक घर मैं विविध रूप से
कठपुतली सी करे अभिनय
बन किसी की घरवाली !! (2)

करे व्यतीत हर पल अपना
आंगन मैं खुशिया बरसाने को
सिंचित करे अपने लहू से
रमणीय घरोंदा सजाने को
बनी स्वंय एक कहानी !! (३)

जिस घर के लिए वो मात्र
एक साधारण सी नारी है
वरन उस स्त्री के लिए वो
आश्रय ही सब कुछ है, और
ये ही सम्पूर्ण दुनियादारी !! (४)

मात्र एक प्राणी जिसके दम पर
दम भरते है हम सब हो कर
अति सर्वोच्च महा अभिमानी
और वो आज भी वही है सिर्फ
नाम की अर्थहीन अबला नारी (५)

नहीं अब अर्थहीन अबला नही
एक शशक्त संपूर्ण सर्वस्व
वो पुष्प जिसकी खुसबू से
महकता है पूर्ण घर संसार
इसलिए संबोघन उचित है
अबला नही वो अब सबला नारी !!
है सबला नारी..! सबला नारी…!! (६)

—::—डी. के. निवातियाँ —-::—-

4 Comments

  1. Rahul 04/04/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/06/2015
  2. Gayatri Sharma 02/03/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/03/2016

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