नव सामंतो कि खङी है अट्टालिकाएं . . . . .

नव सामंतो कि खङी है
हर जगह अट्टालिकाए
क्रुर
सालो से लूटा है
तोङ कर सारी सिमाए
कैसे उसका गीत गाए
क्या कहुँ मन कि ब्यथाए. . . . .
जिसने भुलाया आत्मगौरव
कृति पथ धन लालसा मे
छिन लि है मुँह से रोटी
कैसे उसका गुण गाए
क्या कहुँ मन कि ब्यथाए. . . . .
पश्चिमि पद चिन्ह पर चल
जी रहे पर के सहारे
सभ्यता संस्कृति भाषा
छिनकर दी नव दिशाएँ
क्या कहुँ मन कि ब्यथाए . . .
हँस रहा यमराज जालीम
देखकर मेरी दशाए
सो रहे कविगण “विवेका”
रास्ता कोई बताए
क्या कहुँ मन कि ब्यथाए . . . . .
डा विवेका नन्द मिश्र
डा विवेकानन्द पथ
गोल बगीचा , गया
9431207570

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