कच्ची कली

मैं इक कच्ची कली हूँ

आपके छूने से खिल जाउंगी

मदहोशी कुछ इस कदर है मुझमें

घूर के ना देखना कभी

जो देखोगे तो गिर जाऊँगी

शरारतें हैं कुछ ज्यादा मुझमें

तड़प-तड़प के तुम्हें तड़पाउंगी

संभालना उस दिन जानू मुझे

जब मैं खुद इक कली

तुझ भंवरे से लिपट जाऊँगी

मैं इक कच्ची कली हूँ

आपके छूने से खिल जाउंगी
———————–(Moon)

नीलकमल वैष्णव”अनिश”
Mitra-Madhur (64)

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