ग़ज़ल ……

वक़्त के दरिया में कोई ठहर जाता तो नही
जैसे तुम गए ऐसे भी कोई जाता तो नही

ख़्वाब कितना ही हसीं हो मगर फिर भी
ख़्वाब तो ख़्वाब है हक़ीक़त हो जाता तो नही

कितना ही टूट कर चाहो किसी को मगर वो
निगाहो में खूं बन के उत्तर जाता तो नही

ये बेरूख़ी ज़माने भर की उसपर तेरी रुस्वाई
यकबयक से मौत भी किसी पे आता तो नही

मेरा क्या है मै तो फ़रेब में ज़िंदा हूँ
ज़िंदा हूँ मगर ज़िंदा नज़र आता तो नही

ये ग़म क्या है? इक धोखा है इक छलावा है
बेवजह ये दिल भी मगर मुस्कुराता तो नही

ये मुहीब साये ये रात ये सफ़र तनहा
सिर्फ उजालो के सहारे ही जिया जाता तो नही

हक़ीक़त – सच
रुस्वाई – बेइज़्ज़त
यकबयक – अचानक
फ़रेब – भ्रम
मुहीब – डरावने

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