जीवन के अंधे सफर में

जीवन के अंधे सफर में मै रहा
बेगानी मंजील के अंजाने तल में मै रहा

ब्रम्हांड के बहाव में जलना ही नसीब है बुझने तक रवानी के पल में मै रहा

तुम क्या जानो किस बला का नाम हूँ मै मरते दम तक जीने की अकल में मै रहा

बहती हवा से पुछो मै किस की गंध हूँ बुझकर जलने की अदा पढने में मै रहा

झुमती राहे और हिलती मंझीले देख लो खुदाई के बगैर खुद को जानने में मै रहा

रचनाकार/कवि- धिरजकुमार ताकसांडे (९८५०८६३७२२)

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