हे योगी तेरी किन भावों को मानूँ

हे योगी तेरी किन भावों को मानूँ
हर रूपों में तुम ही समाये,
उन रूपों को पहचानूँ ,हे योगी …..
लघुता-जड़ता पशुता-हन्ता
सब कर्मों के तुम ही नियंता
उन अपराधों को जानूँ ,हे योगी …..
तुम से प्रेरित नील गगन है
जिसमें उड़ता विहग सा मन है
उन परवाजों को जानूँ ,हे योगी ……
दुर्गम पथ पर चलना सिखाते
मुश्किल पल में लड़ना सिखाते
उन सदभावों को जानूँ ,हे योगी …..
हर रूपों ………उन रूपों को …..हे

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