बस एक चिंगारी से सुलगते है लोग

कर रहे हालात बया, जलते है लोग
क्यु वक्त से पहले ही ढलते है लोग

जगाने आए महात्माओं के देस में
क्या आज भी नींद मे चलते है लोग

बेवजा ओढी तृषा हिनता की चादर
दमन मे वासना के अब पलते है लोग

देन होते है बच्चे जहा, फिक्र है कहा जमीन के वास्ते आदमी नीगलते है लोग

अहिंसा दिखती यहा हिंसात्मक अस्त्र मे बस एक चिंगारी से सुलगते है लोग और

क्रांती तो शिक्षा से आयी है मगर
वर्ण भेदो से लोगोको यहॉ खलते है लोग

जींदगी दी दुनिया को बहाकर पसिना फिर भी क्यु मौत को बीलगते है लोग

रचनाकार/कवि- धिरजकुमार ताकसांडे (९८५०८६३७२२)

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