ये कहानी है भारत के संविधान की !

लिखी किस्मत इन्सां ने इन्सान की
ये कहानी है भारत के संविधान की। ज़िन्दगी थी अंधियारी
बंद ज्ञान की तिजोरी
बंधे बंधे हाँथ पाँव थे चल रहे
इस गुलामी को मिटाने
अधिकारों को दिलाने
इक इन्सां का सुरज था कही जल रहा। वह था ज्ञान में मगन
उसके मन अगन
उसके दिल में लगन इन्सान की
ये कहानी है भारत के संविधान की। । 

वर्णभेदोका तूफान
अंग्रेजोसे बलवान
सारे जन को कुचलने था मचल रहा औरत हो या आदमी
थी नसीब ना जमी
डपापी आसमां से भी था बरस रहा
बाबा भींम ले आये
दिए ज्ञान के दिये  
लिखी किस्मत हमारे सम्मान की ये कहानी है भारत के संविधान की

सारे सुख दुख छोड़
ज्ञान सागरसे जोड
ऊँचे भारत का ख़याल था पलने लगा। कैसे मिले अधिकार
खुली प्रगतीके द्वार
अत्याचाऱ की हवासे लढने लगा
धर्म छोड़ना पकड़ना
या लड़ाई मे मर जाना
कैसी लीला थी कलम के महान की
ये कहानी भारत के संविधान की।

इन्कलाब की लढाई
हमने आझादी ये पाई
लोकतंत्र का खयाल उठने लगा
किये प्रजाने ने निर्माण
लिखे सैकड़ों विधान
इन्सान का गुणगान भी बढ़ने लगा
सर्व धर्म समभाव
मिली सभी को इक छाव
किमत राजा ओर रंक इक समानकी
ये कहानी है भारत के संविधान की।

लढ़ते लढ़ते ना थका
कुप्रथाओंको भगा
उसके क्रोध में था बल रे सच्चाईका
ना तो था वो कमजोर
दूरदृष्टी थी घोर
उसने बीड़ा था उठाया रे भलाईका
जब तक सांस
वो हुआ ना था निराश
उसने दिशा दी भारत के निर्माण की
ये कहानी है भारत के संविधान की

रचनाकार/कवि- धिरजकुमार ताकसांडे (९८५०८६३७२२)

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