आँखो से देखा

आखों से देखा अपने चांद तारे पानी मे हमने भी खुद को पाया इसी कहानी मे

होने न होने से तेरे क्या फर्क पडता है बनकर मिटते देखा इसी जिंदगानी मे

बन गया है घर तेरा अब लुटेरों का बसेरा खोजनेवाला लुट जाता यहा परेशानी मे

सृजन के सिर्फ गुण गाता बुढापे मे तेरे जिसने तबाही की थी भरी जवानी मे

न जाने खुदा भटक रहा हमारी खोज मे कोशीश करते रहा हु न रहना रवानी मे

चेहरा अस्तीत्वका समाया एक बुंद मे
बट जाना है कण कण के निशानी मे

रचनाकार/कवि- धिरजकुमार ताकसांडे (९८५०८६३७२२)

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