मुसाफिर भी टूट जाता है

सिर्फ आशियां नहीं मुसाफिर भी टूट जाता है
जिस राह से भी गुजरे सबकुछ लूट जाता है

राहत तो मील जाती है रिश्तो की मांद में पत्थर की बौछाड़ में मगर दामन भी छूट जाता है

जज्बा न रहा अबके समाज सुधार का बस राह-गुजर हो कारवां तो गुबार उठ जाता है

प्यार करने से बढ़ता है ना के संदूक में रखने से
प्यार बंटता नहीं मगर आशिक रूठ जाता है

झूठ के पैर नहीं होते सच ही काम आता है
सच ही के कंधे पर सवार हो झूठ जाता है
तेरा मेरा रिश्ता वैसे तो नहीं है लहू का
पर गमगीन हैतु, तो हलक में कहां घूंट जाता है

रचनाकार/कवि- धिरजकुमार ताकसांडे (९८५०८६३७२२)

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