माँ

Anmol Tiwari
कविता==माँ
मेरे तन्हाई के आलम मैं भी,
एक ख़ुशी दे जाती हैं माँ।
एक दृष्टि मेरी और डाल,
जाने क्या कर जाती हैं माँ।।
क्या जादू है उसके हाथों में,
मैं कभी जान ही ना पाया।
पर कैसे मेरे मन की,
हर बात समझ जाती है माँ।।
हर ग़म के साये मे वो,
पास आकर के मेरे।
अपने पल्लू से पसीने को,
पौछ जाती हैं माँ।।
माँ तू माँ नहीं मेरे,
सीने में धड़कता दिल है।
तभी तो मेरे दिल का ,
हर हाल समझ लेतीं हैं माँ।।
शैशव में सीने से,
बचपन में झूले से।
दिन में गीत लोरियों से,
रात को सुलाती हैं माँ।।
इसीलिए तो बहुत याद आती हैं माँ।।
जवानी की ज़िद मे उससे,
कहीं रूठ ना जाऊँ।
मेरे हर अरमाँ पे ,
ख़ुशियाँ लुटाती हैं माँ।।
मैं कलेजा हूँ उसका,
वों साँसें है मेरी।
तभी तो हर साँस में ,
बसी होती हैं माँ।।
इसीलिए तो इस दुनिया मैं,
सबसे ख़ास होती है माँ
कवि-अनमोल तिवारी” कान्हा”