गीत मांगता हूँ …

मत पूछना कि क्यों मैं, दर्द में उबला हुआ कोई गीत मांगता हूँ।
हे देश, तुझसे आज मैं कुछ अगजला सौगात अतिरिक्त मांगता हूँ।
.
लिख रहा हैं आज हर कोई मौसमो का गीत, या-
फिर डूबकरके रच रहा अपने प्रणय की कथा,
युवतियों के जिस्म की चर्चा तो कराते हैं सभी-
चाहता हूँ मैं लिखूँ कुछ तेरे अंतर की व्यथा।
.
आँसू छलकते नयनों में, कोई स्वप्न अब पुनीत मांगता हूँ।
.
किस तरह सुनसान हो जातीं हैं सड़कें शाम को
किस तरह से बंद हो जाती घरों की खिड़कियाँ,
खौफ को दिल में समेटे जी रहे हैं लोग कैसे-
दर्द होता दिल में फिर भी ले न पाते सिसकियाँ।
.
आज तिमिर के बीच मैं, ज्योतिर्मय दाह की जीत मांगता हूँ।
हे देश, तुझसे आज मैं कुछ अगजला सौगात अतिरिक्त मांगता हूँ।

Leave a Reply