….और तुम हो (गज़ल)

ये तन्हा सा सफ़र है और तुम हो
मेरा जख्मे-जिगर है और तुम हो
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बड़ा गमनाक तूफान आज दिल में है-
जेहन भी मुंतसिर है और तुम हो
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घटाएँ मौत की छाई है ज़ुल्फों में-
बहारें बेअसर है और तुम हो
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तमाशे देखने वाले नहीं कम है
तेरा जल्वा मगर है और तुम हो
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वफ़ा की चाहतों में दम अगर निकले
तलाशे-राहवर हैं और तुम हो
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ख्याले-जुस्तजू में अश्क बहते हैं
ये दरिया है, लहर है और तुम हो
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करे ‘प्रभात’ आहोजारी कबतक के
मेरा दिल मुंतजिर है और तुम हो।

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