गजल

चाँद से होती थी रोज मुलाक़ात वक्त की बात है
आज हो गई अमावस की रात वक्त की बात है

न आह निकाली मुह से चोट खाते रहे उनसे
उन्होंने भी न किया एहतियात वक्त की बात है

पिए थे हर रोज गम और होंठ मुस्कुराते रहे
पर होने न दी आँखों में बर्षात वक्त की बात है

अँधेरों में जलता रहा खुद रोशनी देकर उनको
फिर भी न सूना कभी फरियाद वक्त की बात है
१४-११-२०१४

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