मेरी भी आँखो में आता कोई !

रातो की नींदे, चुराता कोई; मेरी भी आँखों में,आता कोई
ये प्यार की इम्तहा भी सही; मिलता नहीं पर,बुलाता कोई

बेताबीयो का ये फैला धुंआ; मायुसीयो का अंधा कुंआ
मेरी भी रोती है नादानगी; कोहराम सा ये कैसे हुआ
ये प्यार की इम्तहा भी सही; खिलता नहीं पर,लुभाता कोई

चैन आ गया, मिलन की घड़ी; वो सामने है मंज़िल खड़ी
गुमनामीयो, कारवा आ गया; परदे हटाओ जली फुलझड़ी
ये प्यार की इम्तहा भी सही; सिलता नहीं पर,सुहाता कोई

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

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